अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस केवल एक रस्म नहीं, बल्कि उन लाखों संघर्षशील, स्वाभिमानी और कामकाजी महिलाओं के सदियों के प्रतिरोध और बलिदान का परिणाम है, जिन्होंने एक समतामूलक समाज के लिए आवाज़ उठाई।
महिला दिवस की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: संघर्ष से मान्यता तक
वर्ष 1909 में संयुक्त राज्य अमेरिका की सोशलिस्ट पार्टी के आह्वान पर 28 फरवरी को पहली बार महिला दिवस की शुरुआत उन प्रतिष्ठित, स्वाभिमानी तथा कामकाजी महिलाओं के सम्मान में की गई, जिन्होंने दशकों लंबे संघर्ष में भाग लिया। इस पहले प्रदर्शन में लगभग 15,000 महिलाओं ने अपनी हिस्सेदारी दर्ज कराई थी।
वर्ष 1913 तक यह दिवस फरवरी के अंतिम रविवार को मनाया जाता रहा। इसे वैश्विक व स्थायी रूप 1910 में क्लारा ज़ेटकिन (Clara Zetkin) के आह्वान पर मिला, जहाँ 17 देशों की 100 से अधिक प्रभावशाली महिलाओं ने इसका समर्थन किया। इसके फलस्वरूप 1911 में ऑस्ट्रिया, डेनमार्क, जर्मनी और स्विट्जरलैंड ने अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया। 1917 में रूसी क्रांतिकारी महिलाओं के आंदोलन ने इसे और धार दी। अंततः, कई दशकों के संघर्षों के बाद वर्ष 1975 में संयुक्त राष्ट्र (UN) ने 8 मार्च को ‘अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस’ के रूप में आधिकारिक स्वीकृति दी।
भारत में सुधार के अग्रदूत: सावित्रीबाई फुले और बाबासाहेब आंबेडकर
भारत में 13 फरवरी को श्रीमती सरोजिनी नायडू के जन्मदिवस को राष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में देखा जाता है। लेकिन जब हम इतिहास के पन्नों पर पड़ी धूल हटाते हैं, तो त्याग की प्रतिमूर्ति क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले का स्मरण होता है, जिन्होंने 19वीं सदी के मध्य में (1848) तमाम सामाजिक प्रताड़नाओं को झेलते हुए महिलाओं के लिए शिक्षा के द्वार खोले।
वहीं, स्वतंत्र भारत में यदि महिलाओं को कानूनी अधिकार और सुरक्षा मिल सकी, तो उसका बड़ा श्रेय डॉ. भीमराव आंबेडकर को जाता है। उन्होंने हिंदू कोड बिल के जरिए महिलाओं के संपत्ति, विवाह और संरक्षण अधिकारों के लिए संसद में संघर्ष किया और अपनी मांगों के समर्थन में कानून मंत्री के पद से त्यागपत्र तक दे दिया।
आज़ादी के आठ दशक बाद भी कड़वी सच्चाई
आज आज़ादी के लगभग आठ दशक बीतने के बाद भी धरातल पर कई सवाल जस के तस खड़े हैं:
- सामाजिक पाबंदियाँ: घूँघट, बुर्का और धार्मिक स्थलों में प्रवेश पर वर्जनाएँ आज भी स्त्री की स्वतंत्रता पर सवालिया निशान लगाती हैं।
- दहेज और लैंगिक हिंसा: न्याय की देरी, दहेज के नाम पर उत्पीड़न और सार्वजनिक स्थलों पर असुरक्षा की स्थिति लगातार बनी हुई है।
- दोहरा मापदंड: जिस संस्कृति में विद्या की देवी ‘सरस्वती’ और समृद्धि की देवी ‘लक्ष्मी’ हैं, वहाँ सदियों तक महिलाओं को शिक्षा और पैतृक विरासत से बेदखल रखा गया।
- घरेलू भूमिका का संकुचित दायरा: समाज आज भी महिला को केवल “संस्कारी बहू”, “सुंदर पत्नी” या “रसोई संभालने वाली” तक सीमित देखना चाहता है। जब कोई महिला स्वतंत्र सोच के साथ अपने पैरों पर खड़ी होती है, तो उसे सामाजिक सीमाओं का हवाला देकर हतोत्साहित किया जाता है।
ज़मीनी अनुभव: जनता देश संगठन (JDS) का कार्यक्रम
8 मार्च को जनता देश संगठन (JDS) द्वारा आयोजित महिला दिवस सम्मेलन पूरी तरह महिलाओं को समर्पित था, अतिथि, वक्ता और संचालक सभी महिलाएँ थीं। इस मंच पर विभिन्न क्षेत्रों की प्रबुद्ध महिलाओं ने गौरव का अनुभव किया।
परंतु एक कड़वा अनुभव तब देखने को मिला जब कई नेताओं और रसूखदारों ने अपनी पत्नियों को मंच पर भेजने से यह कहकर मना कर दिया कि “उन्हें बाहर जाने की आदत नहीं है” या “उन्हें बोलने का सलीका नहीं आता“। यह पितृसत्तात्मक मानसिकता का वह चेहरा है जो आज भी महिलाओं को घर की चारदीवारी और चूल्हे-चौके तक सीमित रखना चाहता है।
सृष्टि और राष्ट्र निर्माण में नारी की केंद्रीय भूमिका
इतिहास गवाह है कि धर्म, समाज और राष्ट्र का कोई भी बड़ा आंदोलन महिलाओं के त्याग के बिना पूर्ण नहीं हुआ:
- ऐतिहासिक व आध्यात्मिक संदर्भ: मर्यादा पुरुषोत्तम राम को जन्म देने वाली माता कौशल्या, बुद्ध के वैराग्य से पूर्व त्याग की प्रतिमूर्ति यशोधरा, ईसा मसीह को संरक्षण देने वाली माता मरियम और गुरुओं-संतों को जन्म देने वाली नारियाँ ही थीं।
- स्वतंत्रता संग्राम की वीरांगनाएँ: रानी लक्ष्मीबाई, झलकारी बाई, दुर्गा भाभी, उदा देवी, लक्ष्मी सहगल, अरुणा आसफ़ अली, सुचेता कृपलानी, बेगम हज़रत महल और सरोजिनी नायडू जैसी अनगिनत वीरांगनाओं ने स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी।
- संविधान व राजनीति: संविधान सभा में शामिल 15 प्रभावशाली महिलाओं से लेकर आधुनिक भारत में इंदिरा गांधी, सुषमा स्वराज और मायावती जैसी हस्तियों ने देश की नीति-निर्धारण में अपना लोहा मनवाया।
युवा पीढ़ी के लिए संदेश व आह्वान
आज की युवतियों और छात्राओं को जो अवसर व अधिकार मिले हैं, वे सदियों के त्याग के बाद हासिल हुए हैं। इसे व्यर्थ न गँवाएँ। किसी के बहकावे में आकर ऐसा कोई कदम न उठाएँ जिससे आने वाली हज़ारों आकांक्षी बेटियों के रास्ते बंद हो जाएँ।
विज्ञान और तकनीक के इस दौर में हमें मानवीय संवेदनाओं और परस्पर उत्तरदायित्वों को नहीं भूलना चाहिए।
यदि आप किसी शक्ति, देवता या आदर्श को पूजती हैं, तो बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर के योगदान को भी नमन करें, जिन्होंने महिलाओं के अधिकारों के लिए सत्ता तक का त्याग कर दिया। जब आप रूढ़िवादिता से ऊपर उठकर एक स्त्री के रूप में अपने अधिकारों को समझेंगी, तभी सच्चे अर्थों में आज़ादी साकार होगी।
, एडवोकेट पिंकी पवन शिंदे
राष्ट्रिय महासचिव एवं राष्ट्रिय अध्यक्ष महिला विंग